वो कभी 'धूप' कभी 'छाँव'...कभी 'शबनम' सा लगे,
मेरा 'महबूब' भी मेरे गाँव के...'मौसम' सा लगे,
नर्म सी 'धूप' सा...खिले 'दिन' में
रात मैं 'चाँद' वो...'पूनम' सा लगे
रखे 'प्यासा'...कभी 'बदली' सा भिगो दे मुझको
वो मुझे 'काली घटा रिमझिम'...'सावन' सा लगे
दे कभी 'खुशियाँ' मुझे...और कभी 'ग़म' सा लगे
जो 'लिपट' जाए मेरे 'जिस्म' से...'मरहम' सा लगे
यूँ तो देता रहा वो...'ज़ख्म' ही मुझे "भास्कर"
जाने क्या बात थी जो...मुझको वो 'हमदम' सा लगे
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
विज्ञापन
दिल्ली हाईकोर्ट ने विज्ञापन मे चेहरा नहीँ दिखाने के लिये कहा तो केजरीवाल आजकल पिछवाडा दिखा रहे है!! अब सीधे विज्ञापन पे आता हूँ: नमस्कार...
-
दिल्ली हाईकोर्ट ने विज्ञापन मे चेहरा नहीँ दिखाने के लिये कहा तो केजरीवाल आजकल पिछवाडा दिखा रहे है!! अब सीधे विज्ञापन पे आता हूँ: नमस्कार...
-
उजड़ी हुई बस्तियां...लोग अनजाने मिले मुझको मेंरे गाँव...सब वीराने मिले दरो दीवार बची थी... कहीं छज्जा न मिले टूटे कीवाडों में बंद ...त...
-
सुनो!! अब 12 बजने वाले है अपना नाटक बंद कर दो और हाँ वो मेरे जूते तुमने जो आज जबरदस्ती उतारे थे कहाँ रख दिए है? सुबे ढूंढने में परेशनि ह...
No comments:
Post a Comment