सर्द मौसम मैं...
यूँ सिमट जाना...
एक दूसरे की बाँहों मैं..
कंपित होंटों से...
छू लेना उसको...
फिर उसका ...
मेरे आगोश में...
यूँ लिपटना ...
जैसे वादा ले रही हो...
कभी नहीं अलग होने का...
महसूस करना..
गर्म साँसे उसकी...
फिर समा जाना उसमें...
मेरा शब भर के लिए...
और भूल जाना मेरा ...
भूत, भविष्य, वर्तमान...
निकाल पड़ना ...
सपनों की सैर पर...
और दूर हो जाना मुझसे...
घने स्याह अंधकार का ...
खुद को पाना मेरा ...
शांति के अथाह ब्रह्माण्ड मैं...
अचानक सुनाई देना...
चिड़ियों का चहचहाना...
मंदिर की घंटियाँ...
और मस्जिद की अज़ान...
फिर जुदा कर देना इनका हमें...
दिन भर के लिए...
Tuesday, December 14, 2010
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दिल्ली हाईकोर्ट ने विज्ञापन मे चेहरा नहीँ दिखाने के लिये कहा तो केजरीवाल आजकल पिछवाडा दिखा रहे है!! अब सीधे विज्ञापन पे आता हूँ: नमस्कार...
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उजड़ी हुई बस्तियां...लोग अनजाने मिले मुझको मेंरे गाँव...सब वीराने मिले दरो दीवार बची थी... कहीं छज्जा न मिले टूटे कीवाडों में बंद ...त...
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सुनो!! अब 12 बजने वाले है अपना नाटक बंद कर दो और हाँ वो मेरे जूते तुमने जो आज जबरदस्ती उतारे थे कहाँ रख दिए है? सुबे ढूंढने में परेशनि ह...
jahapana tussi gr8 ho......tohfa kabool karo....
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