उफ़ ! ये मौसम
दोपहरी की धूप मैं मेरा , मन कुम्हला जाता है,
आँखें टिकी हुयी किताब पर , मन नहीं पढ़ पाता है |
सूखे हुए होंठ ये कहते , हमको पान कराओ,
फटकर गिर जाय्रेगे , इनपर कुछ तो लेप लगाओ |
सूरज को गुस्से मैं देखो, कैसी अगन उगलता ,
दोपहरी की धूप मैं देखो, कंकड़ पत्थर जलता |
जीने की इक चाह मैं देखो, कितने चहरे चलते,
कारों की इस भीड़ मैं देखो बेकार भी जलते |
सूखे चहरे देख के तुझको, इतना रहम न आया ,
इक पल अपन तेज़ रोक के , कर देता तू छाया |
तरस गए कान सुनने को , मेढक का टर्राना,
बहुत हो गयी गर्मी, अब वर्षा ऋतू तू आजाना |
Tuesday, November 23, 2010
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